ये सोचना की मैं.......
Wednesday, May 13, 2009
by
गोविन्द K. प्रजापत "काका" बानसी
·
1 comments
Labels:
"सिर्फ मैं",
तेरे नाम,
वो तेरा नाम था.....
जब भी तुम्हारी याद.......
Monday, March 30, 2009
by
गोविन्द K. प्रजापत "काका" बानसी
·
2
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Labels:
"सिर्फ मैं",
तेरे नाम
तुम ही तो थे.........
~*~*~*~*~*~*~*जानवर*~*~*~*~*~*~*~*
तुम क्या जानों यादों में खो कर आँखें कितना रोती है,
दिल में अपने दर्द समा कर आँखें कितना रोती है,
तुम क्या जानों सावन का मौसम कितनी आग लगाता है,
बारिश कि बुदों को छुकर आँखें कितना रोती है,
अब तो छोटी सी बात पर भी यह दिल भर सा जाता है,
हल्की सी दिल को लगती है ठोकर आँखें कितना रोती है,
अब तो यह जीना भी हम को कोई बोझ सा लगता है,
दिन भर उस बात को याद कर आँखें कितना रोती है,
जख्म-जख्म है आँखें मेरी माज़ी की परछाई से,
अपने अन्दर लहू डूबों कर आँखें कितना रोती है,
तुम एक दुनियाँ नई गये हो तुम को क्या एहसास,
इन राहों में तन्हा सी हो कर आँखें कितना रोती है..
*~*~*~*~*~*~*तेरे नाम*~*~*~*~*~*~*~*यही तो है.
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