दर्द

Tuesday, January 27, 2009 · 1 comments


***********जानवर************
बरसों हो गये राख बने हुये,
पर धुँआ उठता बार-बार है,
जमाना हो गया जख्म लगे हुये,
क्यों यह रीसता बार-बार है,
मुहब्बत दर्द बन कर रह गई,
अश्कों का सैलाब टुटता बार-बार है,
जीतने कि कोशिश करते है हमेशा,
पर मुकद्दर हराता बार-बार है,
कोई "साहिल" पर पहुचें भी कैसे?
यहाँ तुफान गुजरता बार-बार है,
हर लम्हा बदलती है फितरत जिनकी,
उनसे दिल डरता बार-बार है।
********तेरे नाम********यही तो है

कुछ तो है…….

Saturday, January 24, 2009 · 4 comments

*************जानवर****************
कोई एक आध सपना हो तो फिर अच्छा भी लगता है,
हजारों ख्वाब आंखो में सजा कर कुछ नहीं मिलता.
उसे कहना कि पलकों पर ना टांके ख्वाब के झालर,
समन्दर के किनारे घर बना कर कुछ नहीं मिलता.
यह अच्छा है कि आपस के भ्रम ना टुट पायें,
कभी भी दोस्तों को आजमा कर कुछ नहीं मिलता.
फकत तुम से ही करता हूँ मैं सारे राज की बातें,
हर एक को दास्तां-ए-दिल सुना कर कुछ नहीं मिलता.
अम्ल के सुखते रंग में जरा सा खुन शामिल कर,
मेरे हम-दम फकत बातें बना कर कुछ नहीं मिलता.
************तेरे नाम***********यही तो है

तुम भी कैसे.........

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***********जानवर************
तुम मेरी आंख के तेवर ना भुला पाओगे,
अनकही बात को समझोगे तो याद आऊँगा.
इसी अन्दाज में होते थे मुखातिब मुझसे,
खत किसी और को लिखोगे तो याद आऊँगा.
सर्द रातों के महकते हुए सन्नाटों में,
जब किसी फूल को चुमोगे तो याद आऊँगा.
अब तेरे अश्क में होठों से छुड़ा लेता हुँ,
हाथ से खुद इन्हें पोछोगे तो याद आऊँगा.
शॉल पहनाएगा अब कौन दिसम्बर में तुम्हें,
बारिशों में कभी भीगोगे तो याद आऊँगा.
आज तो अपने दोस्तों की दोस्ती पर हो मगरूर बहुत,
जब कभी टूट के बिखरोंगे तो याद आऊँगा.
********तेरे नाम********यही तो है

यार को मैंने

Friday, January 23, 2009 · 3 comments

*********जानवर*********
तुम्हारा इश्क तुम्हारी वफा ही काफ़ी है,
तमाम उम्र यह आसरा ही काफ़ी है ...
जहां कहीं भी मिलो, मिल के मुस्कुरा देना,
"खुशी" के लिये यह सिलसिला ही काफ़ी है ..
मुझे बहार के मौसम से नहीं कुछ लेना,
तुम्हारे प्यार की रंगीन फ़िज़ा ही काफ़ी है ..
ये लोग कौन सी मन्ज़िल की बात करते है?
मुसाफ़िरों के लिये तो रास्ता ही काफ़ी है.
********तेरे नाम********यही तो है

वो मेरा था…….मेरा ही है।

Thursday, January 22, 2009 · 8 comments

आंखों का रंग, बात का लहजा बदल गया,
वो शख्स एक शाम में कितना बदल गया.
कुछ दिन तो मेरा अक्स रहा,
फिर युं हुआ कि खुद मेरा चेहरा बदल गया.
जब अपने-अपने हाल पर हम-तुम ना रह सके,
तो क्या हुआ जो हम से जमाना बदल गया.
कदमों तले जो रेत बिछी थी वो चल पड़ी,
उस ने छुड़ाया हाथ तो सहरा बदल गया.
कोई भी चीज़ अपनी जगह पर नहीं रही,
जाते ही एक शख्स के क्या-क्या बदल गया.
उठ कर चला गया कोई वाकये के दरमियान,
परदा उठा तो सारा तमाशा बदल गया.
हैरत से सारे लफ्ज़ उसे देखते रहे,
बातों में अपनी बात को कैसे बदल गया.
कहने को एक सेहन में दीवार ही बनी,
घर की फ़िज़ा मकान का नक्शा ही बदल गया.
शायद वफ़ा के खेल में उकता गया था वो,
मंज़िल के पास आकर जो रास्ता ही बदल गया.
“काका" किसी भी हाल पर दुनियाँ नहीं रही,
ताबीर खो गई कभी सपना बदल गया.
मंजर का रंग असल में साया था रंग का,
जिस ने उसे जिधर से भी देखा बदल गया.
अन्दर के मोसमों की खबर उस को हो गयी,
उसने बहार-ए-नाज़ का चेहरा बदल दिया.
आखों में जितने अश्क थे जुगनू से बन गये,
वो मुस्कुराया और मेरी दुनियाँ बदल गया.
अपनी गली में अपना ही घर ढूंढते है लोग,
“गोविन्द" यह कोन शहर का नक्शा बदल गया.