सानिया मलिक!!!!!!!?????

Saturday, April 10, 2010 · 1 comments

<<<<<गोविन्द K.>>>>>>

Wednesday, October 7, 2009 · 0 comments

*~*~*जानवर*~*~*~*
चलो फिर ख्वाब देखते है
दिल कि ज़मीन में उम्मीद के
कुछ बीज बोते है
बे मन्ज़िल सफर में
गुबार से अटे चेहरे को धोते है
चलो हम फिर से कोई ख्वाब देखते है
गुलशन-ए-दिल में
नये मौसम उगाते है
किनारों की ख्वाहिश में
भीगे बदन को फिर से सुखाते है
फिर कोयलों की बोली में
कुछ गीत सुहाने लिखते है
कुछ शेर पुराने लिखते है
कुछ नये अफसाने लिखते है
दिल की ख्वाहिश का
फिर से एहतेराम करते है
चलो यह काम करते है
कोइ ख्वाब देखते है
फिर से गीली रेत पर
सपनों के महल बनाते है
उन महलों की छतों पर
फिर कोयलों को सुनते है
बिखरी हुई खाक से
हम फिर मोती मिलन के चुनते है
और बिखरी माला पिरोते है
चलो फिर ख्वाब देखते है
चलो नये ख्वाब देखते है
*~*~*तेरे नाम *~*~*यही तो है~*~*

Tuesday, July 28, 2009 · 0 comments


इस तरह तो किसी को........

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*~*~*~*~*~*~*जानवर*~*~*~*~*~*~*
टुटा हुआ शीशा फिर जोड़ा नहीं जाता
आँख से निकला हुआ आँसू फिर वापस नहीं आता
तुम तो कह कर भुल चुके हो सब कुछ
लेकिन मुझसे वो पल भुलाया नहीं जाता
तेरी मोहब्बत ने जंजीरे डाली है ऐसी
कि छुड़ाना भी चाहुँ तो छुड़ाया नहीं जाता
महफिल में भी मुझ को तन्हाईं नजर आती है
तेरे बिना ये दिल कहीं और लगाया नहीं जाता
मेरे दिल की दीवारों पर सिर्फ़ तेरा ही नाम लिखा है
मिटाना भी चाहुँ तो मिटाया नहीं जाता
सांस रुकने से पहले एक झलक दिखा जाना
बेवफा जिन्दगी का ऐतबार किया नहीं जाता
*~*~*~*~*तेरे नाम *~*~*~*~*यही तो है*~*~*~*


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मैं तुझे देख तो सकता हुं, मगर छु नहीं सकता,
तु झील में उतरे हुये मंजर की तरह है॥
************************************* गोविन्द K.

तु जो नहीं..........कुछ भी नहीं

Monday, July 27, 2009 · 1 comments



*~*~*~*~*~*~*जानवर*~*~*~*~*~*~*
अगर गुफ्तगु का आगाज में करता
झिझकती, बिगड़ती मगर मान जाती
जो मैं बढ़ कर उसके कदम रोक लेता
वो पांव पटकती मगर मान जाती
अगर चंद कलियाँ उसे पैश करता
वो दामन झटकती मगर मान जाती
मैं कहता ‘चलों तुम को घुमा कर लाता हुँ’
अकड़ती, झिझकती मगर मान जाती
जो मैं उसको तकता.....ज़मीन को वो तकती
अंगुठा रगड़ती मगर मान जाती
जो पीछे से आँचल का फंदा बनाता
बहुत तिलमिलाती मगर मान जाती
वो गुस्से में जो मुझ नाराज होती
बिखरती, तड़फती मगर मान जाती
जो कहता की ‘ राहों पर चलिये संभलकर’
उछलती, मटकती मगर मान जाती
*~*~*~*~*तेरे नाम *~*~*~*~*यही तो है*~*~*~*
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तुझसे तो कोई गिला नहीं है, किस्मत में मेरी सिला नहीं है
"खुशबू" का सौदा हो चुका है ओर फुल अभी खिला नहीं है.
****************************************** गोविन्द K.