दु:ख

Friday, January 30, 2009 · 0 comments

******जानवर*******
दु:ख अनमोल होते है,
कुदरत कि दौलत है,
कभी कुछ देकर जाते है,
कभी सब छीन ले जाते है,
कभी बैचेन करते है,
कभी जीना सिखाते है,
कभी बनाते है जब आंसू
उम्र भर लहु के रुलाते है,
कभी लबों की हँसी बन कर,
नई दुनियाँ सजाते है,
कभी मीठी कसक बन कर,
अंजान खालिश बन कर,
मकान-ए-दिल ये बनाते है,
किसी सूरत नहीं मिटते,
जो इन से दूर भागो तो,
कहीं जाने नहीं देते,
ना जिन्दा रहने देते है,
ना ये आजाद करते है,
नहीं जिस की दवा कोई,
ये ऐसा दर्द होते है,
मगर यह भी एक हकीकत है"काका"
हर एक को तो नहीं मिलते,
बड़े नायब होते है, दु:ख
"दु:ख अनमोल होते है...!!!!!
****तेरे नाम********यही तो है

सब कुछ……… “तेरे नाम” युहीं तो नहीं था……..

Wednesday, January 28, 2009 · 1 comments


************************जानवर**************************
वो कहती है कि क्या अब भी किसी के लिये लाल-हरी चुड़ीयाँ खरीदते हो?
मैं कहता हुँ अब किसी की कलाई पर यह रंग अच्छा नहीं लगता.
वो कहती है कि क्या अब भी किसी के आंचल को ‘आकाश’ लिखते हो?
मैं कहता हुँ अब किसी के आंचल में इतनी जगह कहाँ है?
वो कहती है कि क्या मेरे बाद किसी लड़की से मुहब्बत हुई है तुम्हे?
मैं कहता हुँ, मुहब्बत सिर्फ लड़की पर निर्भर नहीं होती.
वो कहती है कि जान! लहजे में बहुत उदासी सी है?
मैं कहता हुँ कि तितलियों ने भी मेरे दु:ख को महसुस किया है.
वो कहती है कि क्या अब भी मुझे बेवफा के नाम से याद करते हो?
मैं कहता हुँ कि "मेरी जिन्दगी" में यह लफ्ज़ शामिल ही नहीं.
वो कहती है कि कभी मेरे जिक्र पर रो भी लेते होऒगे?
मैं कहता हुँ कि मेरी आंखों को हर वक्त ही फुंआर अच्छी लगती है.
वो कहती है कि तुम्हारी बातों में इतनी गहराई क्यों है?
मैं कहता हुँ कि तेरी जुदाई का बाद मुझको यह ईनाम मिला है....
*******************तेरे नाम******************यही तो है 

दर्द

Tuesday, January 27, 2009 · 1 comments


***********जानवर************
बरसों हो गये राख बने हुये,
पर धुँआ उठता बार-बार है,
जमाना हो गया जख्म लगे हुये,
क्यों यह रीसता बार-बार है,
मुहब्बत दर्द बन कर रह गई,
अश्कों का सैलाब टुटता बार-बार है,
जीतने कि कोशिश करते है हमेशा,
पर मुकद्दर हराता बार-बार है,
कोई "साहिल" पर पहुचें भी कैसे?
यहाँ तुफान गुजरता बार-बार है,
हर लम्हा बदलती है फितरत जिनकी,
उनसे दिल डरता बार-बार है।
********तेरे नाम********यही तो है

कुछ तो है…….

Saturday, January 24, 2009 · 4 comments

*************जानवर****************
कोई एक आध सपना हो तो फिर अच्छा भी लगता है,
हजारों ख्वाब आंखो में सजा कर कुछ नहीं मिलता.
उसे कहना कि पलकों पर ना टांके ख्वाब के झालर,
समन्दर के किनारे घर बना कर कुछ नहीं मिलता.
यह अच्छा है कि आपस के भ्रम ना टुट पायें,
कभी भी दोस्तों को आजमा कर कुछ नहीं मिलता.
फकत तुम से ही करता हूँ मैं सारे राज की बातें,
हर एक को दास्तां-ए-दिल सुना कर कुछ नहीं मिलता.
अम्ल के सुखते रंग में जरा सा खुन शामिल कर,
मेरे हम-दम फकत बातें बना कर कुछ नहीं मिलता.
************तेरे नाम***********यही तो है

तुम भी कैसे.........

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***********जानवर************
तुम मेरी आंख के तेवर ना भुला पाओगे,
अनकही बात को समझोगे तो याद आऊँगा.
इसी अन्दाज में होते थे मुखातिब मुझसे,
खत किसी और को लिखोगे तो याद आऊँगा.
सर्द रातों के महकते हुए सन्नाटों में,
जब किसी फूल को चुमोगे तो याद आऊँगा.
अब तेरे अश्क में होठों से छुड़ा लेता हुँ,
हाथ से खुद इन्हें पोछोगे तो याद आऊँगा.
शॉल पहनाएगा अब कौन दिसम्बर में तुम्हें,
बारिशों में कभी भीगोगे तो याद आऊँगा.
आज तो अपने दोस्तों की दोस्ती पर हो मगरूर बहुत,
जब कभी टूट के बिखरोंगे तो याद आऊँगा.
********तेरे नाम********यही तो है